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जय श्री बालाजी । जय श्री दादोजी । "www.akshaykripa.com" वेबसाईट में दिखाये जाने वाले फोटो तथा विडियो एवं दादोजी श्री अखाराम जी के चमत्कारिक भक्ति, शक्ति और भावनात्मक उल्लेख उनके श्रध्दालुओं की आपबीती घटनाओ से सम्बन्धित है । हम किसी व्यक्ति तथा समुदाय की भावना को ठेस पहुँचाना नही चाहते है । हम सिर्फ दादोजी के भक्तों की आस्था और मान्यताओं को दिखा रहे है । इसमे हम किसी भी तरह का दावा नही करते है एवं किसी भी व्यक्ति तथा समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुँचे तो हम क्षमाप्रार्थी है ।

Mahrishi Dadhichi

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भारतीय वाडग्मय में आज तक के इतिहास मे दानी तो कई तरह के हुए है लेकिन अपनी अस्थियों का दान करने वाले एकमात्र ऋषि महर्षि दधीचि को माना जाता है।
प्रतिवर्ष भादव सुदी अष्टमी को पूरे देश में उनके वंशज माने जाने वाले दाधीच उनकी जंयती धूमधाम से मनाते है। लोक देवता बाबा रामदेव जी के मेले से दो पूर्व महर्षि दधीचि की जयन्ती मनाई जाती है। कहा जाता है कि महर्षि दधीचि ने अपनी हड्डियो का दान कर देवताओ की रक्षा की थी। कहा जाता है कि भारतीय वाडग्मय मे देह दान की परम्परा महर्षि दधीचि के देह दान से ही प्रारम्भ हुई ।

कहा जाता है कि एक बार इन्द्रलोक पर वृत्रासुर नामक राक्षस ने देवलोक पर अधिकार कर लिया तथा इन्द्र सहित देवताओं को देवलोक से निकाल दिया। सभी देवता अपनी व्यथा लेकर ब्रहम्मा विष्णु व महेश के पास गएा लेकिन कोई भी उनकी समस्या का निदान न कर सका। लेकिन ब्रहम्मा जी ने देवताओं को एक उपाय बताया कि पृथ्वी लोक मे एक महर्षि दधीचि रहते है यदि वे अपनी अस्थियो का दान करे तो उनकी अस्थियो से बने शस्त्रो सेवृत्रासुर मारा जा सकता है क्योकि वृत्रासुर को किसी भी अस्त्र शस्त्र से नही मारा जा सकता महर्षि दधीचि की अस्थियो मे ही वह ब्रहम्म तेज है जिससे वृत्रासुर राक्षस मारा जा सकता है इसके अलावा कोई उपाय नही है ।

देवराज इन्द्र महर्षि दधीचि के पास जाना नही चाहते थे क्योकि कहा जाता है कि इन्द्र ने एक बार दधीचि का अपमान किया था अपमान किया था जिसके कारण वे दधीचि के पास जाने से कतरा रहे थे। कहा जाता है कि ब्रहम्म विद्या का ज्ञान पूरे विश्व मे केवल दधीचि को ही था। वे पात्र व्यक्ति को ही इसका ज्ञान देना चाहते थे लेकिन इन्द्र ब्रहम्म विद्या प्राप्त करना चाहते थे दधीचि की दृष्टि मे इन्द्र इस विद्या के पात्र नही थे इसलिए उन्होने पूर्व मे इन्द्र को इस विद्या को देने से मना कर दिया था। इन्द्र ने उन्हे किसी अन्य को भी यह विद्या देने को कहा तथा कहा कि यदि आपने ऐसा किया तो मै आपका सिर धड से अलग कर दूंगा। महर्षि ने कहा कि यदि कोई पात्र मिला तो मै उसे अवश्य यह विद्या दूंगा। कुछ समय बाद इन्द्र लोक से ही अश्विनी कुमार महर्षि दधीचि के पास यह विद्या लेने पहुंचे महर्षि को वे इसके पात्र लगे उन्होने अश्विनी कुमारो को इन्द्र द्वारा कही गई बाते बताई तब अश्विनी कुमारो ने महर्षि दधीचि के अश्व का सिर लगाकर यह विद्या प्राप्त कर ली इन्द्र को जब यह जानकारी मिली तो वह पृथ्वी लोक मे आया और अपनी घोषणा अनुसार महर्षि दधीचि का सिर धड से अलग कर दिया। अश्विनी कुमारो ने महर्षि के असली सिर को वापस लगा दिया। इस कारण इन्द्र ने अश्विनी कुमारो को इन्द्र लोक से निकाल दिया । यही कारण था कि अब वे किस मुंह से महर्षि दधीचि के पास उनकी अस्थियों का दान लेने जाते।

लेकिन उधर देवलोक पर वृत्रासुर राक्षस के अत्याचार बढते ही जा रहे थे वह देवताओ को भांति भांति से परेशान कर रहा था। अन्ततः इन्द्र को इन्द्र लोक की रक्षा व देवताओ की भलाई के लिए और अपने सिंहासन को बचाने के लिए देवताओ सहित महर्षि दधीचि की शरण मे जाना ही पडा। महर्षि दधीचि ने इन्द्र को पूरा सम्मान दिया तथा आने आश्रम आने का कारण पूछा देवताओ सहित इन्द्र ने महर्षि को अपनी व्यथा सुनाई तो दधीचि ने कहा कि मै देवलोक की रक्षा के लिए क्या कर सकता हू देवताओ ने उन्हे ब्रहमा विष्णु व महेश की कही बाते बताई तथा उनकी अस्थियो का दान मांगा। महर्षि दधीचि ने बिना किसी हिचकिचाहट के अपनी अस्थियो का दान देना स्वीकार कर लिया उन्होने समाधी लगाई और अपनी देह त्याग दी। उस समय उनकी पत्नी आश्रम मे नही थी अब समस्या ये आई कि महर्षि दधीचि के शरीर के मांस को कौन उतारे सभी देवता सहम गए। तब इन्द्र ने कामधेनु गाय को बुलाया और उसे महर्षि के शरीर से मांस उतारने हेतु कहा। कामधेनु गाय ने अपनी जीभ से चाटकर महर्षि के शरीर का मांस उतार दिया। जब केवल अस्थियों का पिंजर रह गया तो इन्द्र ने दधीचि की अस्थियों का वज्र बनाया तथा उससे वृत्रासुर राक्षस का वध कर पुनः इन्द्र लोक पर अपना राज्य स्थापित किया!

महर्षि दधीचि ने तो अपनी देह देवताओ की भलाई के लिए त्याग दी लेकिन जब उनकी पत्नी वापस आश्रम मे आई तो अपने पति की देह को देखकर विलाप करने लगी तथा सती होने की जिद करने लगी कहा जाता है कि देवताओ ने उन्हे बहुत मना किया क्योकि वह गर्भवती थी देवताओ ने उन्हे अपने वंश के लिए सती न होने की सलाह दी लेकिन वे नही मानी तो सभी ने उन्हे अपने गर्भ को देवताओ को सौपने का निवेदन किया इस पर वे राजी हो गई और अपना गर्भ देवताओ को सौपकर स्वयं सती हो गई । देवताओ ने दधीचि के वंश को बचाने के लिए उसे पीपल को उसका लालन पालन करने का दायित्व सौपा। कुछ समय बाद वह गर्भ पलकर शिशु हुआ तो पीपल द्वारा पालन पोषण करने के कारण उसका नाम पिप्पलाद रखा गया। इसी कारण दधीचि के वंशज दाधीच कहलाते है।

एक हुवे ऋषि महात्यागी, बलशाली, ज्ञानी थे पौत्र ब्रह्मा के, ऋषि अथर्वा की निशानी भाद्र मास की शुक्ल अष्टमी जन्म जगजानी नाम रखा दधिची, बड़े तेजश्वी, बलशाली ! ऋषि दधिची की वेदवती जीवन संगनी बनी महा-शिव रचित शरश्वेत तीर्थ तपस्थली बनी एक बार ऋषि से मित्र राजा छुवा की ठनी प्रसंग था ब्राहमण श्रेष्ठ या क्षत्रिये बलवानी ! पहले जीता राजा, पाए दधिची शुक्रचार्ये से संजीवनी तब दधिची ने की शिव आराधना, बने वज्र्शाली जब हारे छुवा और विष्णु, हुवे ब्राह्मन गौरव-शाली नारायण कवच प्रदान कर, विष्णु ने ब्रह्मशक्ति जानी ! सब देख इन्द्र हुवे प्रसन्न, मधुविधा दे दिनी वचन पाया रखेगे गुप्त, न जाने दूसरा प्राणी लोकहित में ऋषि ने अश्वनीकुमारो की बात मानी लगा अश्व सर, कुमारो को मधुविधा देने की ठानी ! एक बार वज्रास्त्र दधिची को सौंप देवो ने आज्ञा लीनी सहस्त्र वर्ष उपरांत, दधिची ने शस्त्र शक्ति थी पि ली व्रतासुर ने मचा कोहराम, जब देवो की शक्ति छिनी तब इन्द्र ने दधिची से वज्रास्त्र की याचना किनी ! दधिची ने वज्र शक्ति तो पिली, पर देवो को अस्थि दिनी अस्थिदान पूर्व देव, तीर्थ, ऋषि दर्शन विनती किनी फिर दर्शन धरा नैमिशारण्ये-मिश्रित तीर्थ स्थली बनी व्रतासुर मरा, जब दधिची की अस्थियो से वज्रशक्ति बनी ! पुत्र पिप्पलाद हुवे, दधिची बने विश्व प्रथम देह्दानी, आनंद मन की रचना, दधीचो में इतिहास बनी !

Akharam Ji : One of most legent person of Dadhich Samaj
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भक्त शिरोमणि श्री दादाजी अखारामजी महाराज परसनेऊ गांव के पास ही नाडिया (तालाब) के समीप कैर व कमुठोँ के पास श्री बालाजी महाराज की धुणी रमाते एवं गायेँ चरातेँ थे ।श्रीदादोजी महाराज को गाँव के नागरिक गुंगीया (भोला) कहकर पुकारते थे ।

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सर्प आदि के जहर व भुतप्रेत आदि के प्रभाव से मुक्ति के लिये भभूति व कलवाणी रुपी औषध का वरदान दिया जिससे आज भी वहां भक्तोँ के दुःख क्षणभर मेँ कट जाते हैँ ।

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श्री दादाजी महाराज के श्राद्ध के प्रसाद(लापसी) की ऐसी मान्यता हैँ की अगर जरा भी लापसी का प्रसाद खाने को मिल जाये तो 12 मास व्यक्ति रोगो से दुर रहता हैँ ।

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श्री दादाजी महाराज के जन्म दिवस भादवा बदी पंचमी एवमं आसोज माह मेँ श्राद्ध (आसोज बदी पंचमी) पंचमी पर परसनेऊ धाम मेँ भव्य मेलोँ का आयोजन

  • श्री दादाजी महाराज को वचन सिद्धि प्रदान की
  • भभूति व कलवाणी रुपी औषध का वरदान
  • गरीबो ,निशक्तो एवमं कमजोरो के दास
  • गाँव मेँ 'अक्षय कृष्ण गौशाला '
  • 'दादा अक्षय विकलांग सेवा संस्थान परसनेऊ '
  • ठहरने के लिये धर्मशाला व जल आदि की उत्तम व्यवस्था
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अपनी अस्थियों का दान करने वाले एकमात्र ऋषि महर्षि दधीचि को माना जाता है। प्रतिवर्ष भादव सुदी अष्टमी को पूरे देश में उनके वंशज माने जाने वाले दाधीच उनकी जंयती धूमधाम से मनाते है।

Dec 2011, Jaipur

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श्री दादाजी महाराज गायेँ चराते थे एवमं गरीबो ,निशक्तो एवमं कमजोरो के दास थे ।

Jan 2012, Barmer

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सपरिवार सिद्धपीठ परसनेऊ धाम पधार कर अपनी मनोकामनाएँ पूर्ण करेँ व श्री दादाजी अखाराम जी महाराज द्वारा चलाई भक्ति की पावन धारा को आगे चलायेँ

March 2012, Chittorgarh

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दधीचि ने कहा कि मै देवलोक की रक्षा के लिए क्या कर सकता हू देवताओ ने उन्हे ब्रहमा विष्णु व महेश की कही बाते बताई तथा उनकी अस्थियो का दान मांगा।

May 2012, Ajmer

Pujari Pariwar
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