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जय श्री बालाजी । जय श्री दादोजी । "www.akshaykripa.com" वेबसाईट में दिखाये जाने वाले फोटो तथा विडियो एवं दादोजी श्री अखाराम जी के चमत्कारिक भक्ति, शक्ति और भावनात्मक उल्लेख उनके श्रध्दालुओं की आपबीती घटनाओ से सम्बन्धित है । हम किसी व्यक्ति तथा समुदाय की भावना को ठेस पहुँचाना नही चाहते है । हम सिर्फ दादोजी के भक्तों की आस्था और मान्यताओं को दिखा रहे है । इसमे हम किसी भी तरह का दावा नही करते है एवं किसी भी व्यक्ति तथा समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुँचे तो हम क्षमाप्रार्थी है ।

सलासर बालाजी

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सलासर ग्राम में पं. सुखराम जी निवास करते थे, किन्तु भाग्य की विडम्बना से पंडित सुखराम जी का पुत्र उदय जब शिशुकाल मे था, जब पंडित जी का स्वर्गवास हो गया। उस वक्त उनका प्राण प्यारा पुत्र मात्र 5 वर्ष की उम्र का था। रूल्याणी ग्राम से पं. लच्छीरामजी के छहों: पुत्र सालासर आ पहुँचे और अपनी शुकाकुल बहन कान्ही को सांत्वना दी। इसके पश्चात कान्ही अपने अबोध पुत्र को लेकर भार्इयों के साथ मायके चली गयी।

पं. लच्छीराम जी के सबसे छोटे पुत्र मोहनदास के नामकरण के समय ही ज्योतिषियों ने भविष्यवाणी की थी कि आगे चल के यह बालक एक तेजस्वी सन्त पुरुष बनेगा, जिसका यश दुनिया में चहुंदिशा विस्तृत होगा। बचपन से ही उनकी गम्भीर मुख-मुद्रा को देखकर ऐसा प्रतित होता था कि जैसे वह भगवान के ध्यान में मगन हैं। ऐसा पूर्वजन्म के पुण्य प्रताप से ही सम्भव है। कालान्त में पंडित लच्छीराजी के देहान्त के पश्चात मोहनदास अपना अधिकांश समय र्इश्वर के स्मरण मे ही व्यतीत करने लगे। साथ ही उन्हे परिवार एंव संसार से विरक्ति उत्पन्न होने लगी। सामुहिक परिवार मे अधिक समय तक साथ न रहने का विचार कर कान्ही बार्इ ने सालासर आने का संकल्प किया। मोहनदास ने अपने भार्इयो से पूछा कि बहन के यह सकंटपूर्ण दिन कैसे व्यतीत होगे ? उसे तो सहारे की आवश्यकता है हम भार्इयों में से एक को भानजे उद्य के बडे होने तक कृषि कार्य में सहयोग करना चाहिये। किन्तु पाँचों भार्इयों ने उत्तर दिया कि हम तो बाल बच्चे वाले है और बहन का अन्न नहीं ग्रहण कर सकते, इसलिये वहाँ रहने में असमर्थ है । भार्इयो के द्वारा यह वचन सुन कर मोहनदास जी का मन उदास हो गया कि सगे भार्इ भी विपत्ती में साथ छोड देते है तब उन्होने अपने मन में दृढ-संकल्प लिया कि मैं स्वयं बहन के पास रहूँगा और बोले कि बहन मैं आजीवन तेरे साथ रहूँगा इन भार्इयों को यही रहने दो। तुम अपने मन में कोर्इ दुख मत लाओं, मैं तुम्हारे साथ हूँ।

इस प्रकार समझाकर मोहनदास जी अपने जन्म स्थान रुल्याणी से विदा होकर बहन के साथ ही उसके घर में रहने लगे। इसी के साथ र्इश्वर की भक्ति भी करते रहें । कुछ ही वर्षो के परिश्रम से मोहनदास जी अपनी बहन के खेतों को सोना उगलने वाले उपजाऊ बना दिये। श्रावस मास में एक दिन उदयराम जी खेत में हल चला रहे थे और मोहनदासजी बंजर भूमि को कृषि के योग्य बना रहे थे। स्वयं हनुमान जी ने साक्षात प्रकट होकर उन्हे कृषि के कार्य से विरक्त होने का आदेश दिया और मोहनदासजी के हाथ से गण्डासी छीनकर दूर फेक दी, किन्तु वे उसे उठाकर पुन: सुड करने लगे, ्िर छीनकर फेंक दी और र्इश्वर के भजन करने का आदेश दिया । इस प्रकार यह लीला कर्इ बार हुर्इ। उदयरामजी दूर से यह सब देख रहे थे कि मामाजी बार बार गंडासी दूर फेंकते है और दुबारा उसे उठा लाते है, उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ। वे हल छोडकर पास में आये और उनके स्वास्थ्य के बारे में पुछा कि आपका चित ठीक नहीं है, आप दो घंड़ी आराम कर लिजिये किन्तु मोहनदास जी ने बताया कि कोर्इ देवता मेरे पीछे पड़े हैं, मेरा ख्ति ठीक नहीं हैं। इस दस घटना की चर्चा सायंकाल उदयरामजी ने अपनी माँ से की और कहा कि मामाजी का मन काम करने में नही लगता है, अगर हम इनके भरोसे रहे तो इस बार धान नहीं होगी। कान्ही बार्इ के मन में विचार आया कि मोहन का विवाह अभी तक नहीं हुआ है, यदि इन्हे विवाह बन्धन में बांध दिया जाये तो इनका चित स्थिर हो जायेगा । भार्इ मोहनदास के विवाह सम्बन्ध के लिए प्रयास करने लगी। कान्ही बार्इ के द्वारा विवाह के सम्बन्ध में पूछने पर हर बार मोहनदासजी मना कर देते थे, लेकिन बहन ने सोचा कि भार्इ संकोच के कारण मना करता है, इसलिए वह विवाह की तैयारी में लगी रही । एक रिश्ता पक्का हो गया । सगार्इ में देने के लिए सोने के गहने बनवायें एंव नार्इ को लड़की के घर नेगचार करने के लिए भेजा किन्तु वहां पहुँचने के पूर्व ही उस कन्या की मृत्यु हो गर्इ। भक्त मोहनदास जी ने उक्त घटना के सम्बन्ध में भविष्यवाणी पूर्व में ही कर दी थी। अब सबको उनके ज्ञान पर आश्चर्य हुआ। इसके प्श्चात कान्ही बार्इ ने उनके विवाह के लिए पुन: नहीं कहा और स्वयं भी र्इश्वर का भजन करने लगी, उपरोक्त घटना के बाद भक्त मोहनदासजी जीवन-पर्यन्त ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए मौनव्रत धारण करके कठिन तपोमय जीवन व्यतीत करने लगे। कुछ समय पश्चात् कान्ही बार्इ के घर भगवान हनुमाजी साधु का रुप धर कर भिक्षा मांगने आ गये, जिस प्रकार भक्त भगवान के दर्शन को तरसते है उसी प्रकार भगवान भी अपने प्यारे भक्तों को जाकर दर्शन देते है । उस समय कान्ही बार्इ मोहनदास और उदय को भोजन करा रही थी। इस कारण से उन्हे भिक्षा देने मे देर हो गर्इ । थोड़ी देर में कान्ही बार्इ ने द्वार पर देखा तो वहाँ कोर्इ नहीं था , जब वह वापस अन्दर आर्इ तो उसे उसी साधु की उपस्थिति का ज्ञान हुआ किन्तु देखने पर कोर्इ दिखार्इ नहीं पड़ा। इसके बाद मोहनदास जी ने बताया कि ये तो स्वयं बालाजी महाराज थे, जो दर्शन देने आये थे। तब कान्ही बार्इ ने भार्इ से आग्रह किया भगवान बालाजी के दर्शन हमें भी कराओं। दो माह प्श्चात दुबारा भगवान श्री हनुमान जी ने द्वार पर आकर नारायण हरी, नारायण हरी का उच्चारण किया । तब कान्ही बार्इ ने मोहनदासजी को बताया कि कोर्इ साधु बाहर खड़ा है, इतना सुनकर मोहनदास जी द्वार पर आये और देखा तो श्री बालाजी वापस जा रहे थे, वे उनके पीछे पीछे दौड़े, काफी दूर जाने पर सन्त वेशधारी बालाजी ने उनकी परीक्षा लेने के लिए उनको डराया धमकाया, लेकिन भक्त अपने भगवान से कहां डरते हैं, मोहनदास जी ने हनुमान जी के चरण-कमलों को मजबूती से पकड़ लिया। तब हनुमानजी ने उनसे कहा कि तुम मेरे पीछे पीछे मत आओ। मैं तुत्हारी निश्चल भक्ति से प्रसन्न हूँ। तुम जो भी वर माँगोगे मैं तुमको अवश्य दूँगा। मोहनदास जी ने हाथ जोड़कर कहा कि आप बहन कान्ही बार्इ के निवास-स्थान पर अवश्य चलिये।

भक्तवत्सल श्री हनुमानजी महाराज ने उत्तर दिया, में अवश्य चलूँगा किन्तु मैं केवल पवित्र आसन पर ही बैठूँगा और मिश्री सहित खीर व चूरमे का नैवेद्य स्वीकार करुँगा। भक्त शिरोमणी मोहनदास जी द्वारा सभी प्रकार के आश्वासन देने तथा अत्यधिक प्रेम व आग्रह से परम कृपालु श्री बालाजी महाराज उनकी बहन कान्ही बार्इ के घर पधार गये और खीर व खांड से बना हुआ चूरमा खाकर गहुत प्रसन्न हुए। भोजन पश्चात् विश्राम करने के लिए पहले से तैयार शैय्या पर विराचमान हुये। भार्इ-बहन की श्चिल सेवा-भक्ति से प्रसन्न होकर श्री बालाजी ने कहा कि कोर्इ भी मेरे छाया (आवेश) को अपने ऊपर करने की चेष्टां नहीं करेगा। श्रध्दा सहित जो भी भेंट दी जायेगी, मैं उसको प्रेम के साथ ग्रहण करुंगा और अपने भक्त की हर मनोकामना पूर्ण करुंगा एंव इस सालासर स्थान मे सदैव निवास करुंगा। ऐसा कहकर श्री बालाजी अन्र्तध्यान हो गये। तत्पश्चात् भक्त शिरोमणी श्री मोहनदासजी उस गाँव के बाहर एक बालू के टीले के ऊपर छोटी सी कुटिया बनाकर उसमें निवास करने लगे।

एकान्तप्रिय होने के कारण और किसी से न बोलने के कारण भी सांसारिक लोग उन्हे पागल समझ बैठते है। इसी कारण से भक्त शिरोमणी श्री मोहनदास जी को लोग बावलिया नाम से पुकारने लगे। वे सभी सांसारिक झंझटो से बचने के लिए एक निर्जन स्थान मे शमी(जाँटी) वृक्ष के नीचे अपना आसन लगाकर बैठ गये और मानव्रत का पालन करने लगे।

एक बार की बात है कि इस शमी वृक्ष के नीचे मोहनदासजी अपने धूनी रमाकर तपस्या कर रहे थे, वह वृक्ष फलों से लद गया था। तभी एक दिन उस वृक्ष पर एक जाट का पुत्र चुपचाप चढ़कर शमी के फल (सांगरी) तोडने लगा। डर के कारण घबराहट में कुछ फल मोहनदास जी के ऊपर गिर पड़े, जिससे उनका ध्यान भगं हो गया। उन्होने सोचा कि कहीं कोर्इ पक्षी घायल होकर तो नहीं गिरा और उन्होने अपनी आँखे खोल दर। जाट का पुत्र भय से काँप् उठा। मोहनदास जी ने उसे भयमुक्त करके नीचे आने को कहा। नीचे आने पर उससे पुछा कि तुम यहाँ क्यों आये हो, तुमको किसने भेजा है ? उसने बताया की माँ के मना करने के बाद भी मेरे पिता ने मुझे यहां सांगरी ले आने के लिए आने के लिए विवश किया और कहर कि तुझे बावलिया से क्या डर, वह तुझे खा थोड़े जायेगा ? ऐसा सुनकर भक्त प्रवर ने कहा कि जाकर अपने पिता से कह देना - इन सांगरियों का साग खाने वाला व्यक्ति जीवित नहीं रह सकता। जनश्रुति के अनुुसार उस जाट ने महात्मा मोहनदास जी के द्वारा मना करने के पश्चात भी वह सांगरी साग खा लिया और उसकी मृत्यु हो गर्इ। उस जाट को साधु का तिरस्कार करने का दण्ड मिल गया।

जनश्रुति के अनुसार आजन्म ब्रह्मचारी भक्त मोहनदास जी के साथ निर्जन स्थान में श्री हनुमान जी महाराज स्वयं बाल-क्रीड़ायें करते थे।

एक बार भक्त शिरोमणी के शरीर पर मल्ल युध्द के खेल में लगी चोटों को देखकर उनके भानजे उदयराम ने उसके बारे में पुछा, तब मोहनदास जी ने अबोध ग्वालों द्वारा पीटने का बहाना बनाकर उसे ठाल दिया, परन्तु उदयराम को इस पर सन्तोष नहीं हुआ। और उन्होने खोजियों को बुलाकर सारी बात बतार्इ और खोजियों ने पैरों के चिन्ह को देखकर रहस्य का पता लगाने को कहा। जब खोजियों ने पैरों के चिन्ह देखे तो उन्हे कोर्इ पद-चिन्ह काफी बड़ा और कोर्इ चिन्ह बहुत छोटा मिला। कहीं कहीं पर तो वे पद चिन्ह मिले ही नहीं। अन्तत: पद चिन्ह अन्वेषक सच्चार्इ का पता लगाने में पूरी तरह असफल हो गये और वे उदयराम जी से हाथ जोड़कर बोले कि ये पद चिन्ह किसी मनुष्य के नहीं है बल्कि किसी देवता या राक्षस के हैं।

स्ंवंत 1811(स्न 1754र्इ.) में प्रात: काल सुर्योदय के समय नागौर क्षेत्र के आसोटा निवासी एक जाट कृषक को अपने खेत में हल जोतते समय हल के फाल से कुछ टकराने की आवाज सुनार्इ पड़ी और उस समय हल रुक गया तब उसने उस जगह की खुदार्इ करके देखा तो वहाँ एक मूर्ति थी उसने उसे निकाल लिया किन्तु उस मूर्ति की ओर कोर्इ ध्यान नहीं दिया थोड़ी देर बाद उसको पेट मे तेज दर्द हुआ उसने अपनी पत्नी से सारा कथा बखान की।

जाटनी बुद्विमति थी अत् उसने उस प्रतिमा को पोछ कर स्वच्छ किया और पूरी श्रध्दा सहित बाजरे के चूरमें का भोग लगाया तभी मानो चमत्कार हुआ उस किसान का दर्द ठीक हो गया ।

इस घटना को सुनकर आसोटा के ठाकुर उस मूर्ति के दर्शन को वहाँ आये और दर्शन करके उस मारुतिनंदन की मूर्ति को अपने महल में ले आये । रात में सोते समय ठाकुर को श्री हनुमान जी ने प्रकट हो कर दर्शन दिये और आज्ञा दी कि तुम तत्काल ही इस मूर्ति को सालासर पहुँचा दो उसी रात में भक्त शिरोमणी मोहनदास जी को भी श्री हनुमान जी ने दर्शन दिये और कहा की तुम्हे दिये हुये वचन को निभाने के लिये मैं स्वंय मूर्ति के रुप में आ रहा हूँ जिसे आसोटा के ठाकुर ने अपनी सुरक्षा में भेजा है। प्रभु की आज्ञा पा कर मोहनदासजी ने प्रात:काल शीघ्र ही नित्य कर्मो से निवृत होकर गाँव में जा कर सभी को सूचना दी और उनके साथ किर्तन करते हुये श्री बजरंगबली की मूर्ति की अगवानी हेतु प्रस्थान किया। आगे जाने पर पावोलाव नामक तलाब के निकट भक्त और भगवान का अविस्मरणीय मिलन हुआ । उसके उपरान्त उक्त बेलगाड़ी के बैल अपने आप सालासर के लिये चल पड़े ।

संवंत 1811 र्इ.(स्न 1754)में श्रावण शुक्ला नवी तिथि शनिवार के दिन श्रीहनुमानजी की मूर्ति की स्थापना हुर्इ। संवंत 1811 श्रावण शुक्ला द्वादशी मंगलवार को भक्त शिरोमणी श्री मोहनदास जी भगवान का ध्यान करते करते भक्तिरस में इतना सराबोर हो गये की भाव विभोर हा उठे। इसी स्थिति में उन्होने घी और सिंदूर का लेपन श्री मारुतिनंदन की प्रतिमा पर करके उन्हे श्रृंगारित किया और उन्हे दाढी मूछ, मस्तक पर तिलक, विकट भौहें, सुन्दर आँखें बनाकर मारुतिनंदन को नया रुप दिया।

कालान्तर में लगातार एकान्त वास करते हुये साघना में लिपत रहने की प्रबल अभिलाषा के कारण भक्त मोहनदासजी ने अपने भान्जे उदयरामजी को अपना चोला प्रदान किया एंव मंदिर हेतु प्रथम पूजारी के रुप में नियुक्ति की तब से मोहनदास जी द्वारा दिये गये चोले पर ही विराजमान होकर पूजा की रीती चली आ रही हैं तत्पश्चात् संवंत 1850 की वेसाख शुक्ल त्रयोदशी को प्रात:काल शुभ बेला में भक्त शिरोमणी श्री मोहनदास जी जीवित समाधिस्थ हो गये समाधि ग्रहण के समय मंद गति से जल की फूहारों के साथ पुष्पों की वर्षा होने लगी थी।

कलियुग में सालासर धाम साक्षात फलदायक पावन धाम हैं भगवान पवनपुत्र अपने सखा मोहनदास जी को दिये वचन के अनुसार सालासर मे रह कर सभी भक्तो की मनोकामना पूर्ण कर रहे है।

Akharam Ji : One of most legent person of Dadhich Samaj
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भक्त शिरोमणि श्री दादाजी अखारामजी महाराज परसनेऊ गांव के पास ही नाडिया (तालाब) के समीप कैर व कमुठोँ के पास श्री बालाजी महाराज की धुणी रमाते एवं गायेँ चरातेँ थे ।श्रीदादोजी महाराज को गाँव के नागरिक गुंगीया (भोला) कहकर पुकारते थे ।

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सर्प आदि के जहर व भुतप्रेत आदि के प्रभाव से मुक्ति के लिये भभूति व कलवाणी रुपी औषध का वरदान दिया जिससे आज भी वहां भक्तोँ के दुःख क्षणभर मेँ कट जाते हैँ ।

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श्री दादाजी महाराज के श्राद्ध के प्रसाद(लापसी) की ऐसी मान्यता हैँ की अगर जरा भी लापसी का प्रसाद खाने को मिल जाये तो 12 मास व्यक्ति रोगो से दुर रहता हैँ ।

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श्री दादाजी महाराज के जन्म दिवस भादवा बदी पंचमी एवमं आसोज माह मेँ श्राद्ध (आसोज बदी पंचमी) पंचमी पर परसनेऊ धाम मेँ भव्य मेलोँ का आयोजन

  • श्री दादाजी महाराज को वचन सिद्धि प्रदान की
  • भभूति व कलवाणी रुपी औषध का वरदान
  • गरीबो ,निशक्तो एवमं कमजोरो के दास
  • गाँव मेँ 'अक्षय कृष्ण गौशाला '
  • 'दादा अक्षय विकलांग सेवा संस्थान परसनेऊ '
  • ठहरने के लिये धर्मशाला व जल आदि की उत्तम व्यवस्था
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अपनी अस्थियों का दान करने वाले एकमात्र ऋषि महर्षि दधीचि को माना जाता है। प्रतिवर्ष भादव सुदी अष्टमी को पूरे देश में उनके वंशज माने जाने वाले दाधीच उनकी जंयती धूमधाम से मनाते है।

Dec 2011, Jaipur

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श्री दादाजी महाराज गायेँ चराते थे एवमं गरीबो ,निशक्तो एवमं कमजोरो के दास थे ।

Jan 2012, Barmer

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सपरिवार सिद्धपीठ परसनेऊ धाम पधार कर अपनी मनोकामनाएँ पूर्ण करेँ व श्री दादाजी अखाराम जी महाराज द्वारा चलाई भक्ति की पावन धारा को आगे चलायेँ

March 2012, Chittorgarh

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दधीचि ने कहा कि मै देवलोक की रक्षा के लिए क्या कर सकता हू देवताओ ने उन्हे ब्रहमा विष्णु व महेश की कही बाते बताई तथा उनकी अस्थियो का दान मांगा।

May 2012, Ajmer

Pujari Pariwar
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